रिपोर्ट :- अजय रावत


गाजियाबाद :-
        हॉस्पिटल कोलंबिया एशिया में नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ.अनंत वीर ने बताया कि कोलंबिया एशिया हॉस्पिटल, “किसी  भी व्यक्ति का जिसका अंग क्षतिग्रस्त होता है और जिसको ठीक नहीं किया जा सकता है, उसको फिर ख़राब अंगो को ट्रांसप्लांट कराने के लिए डोनर की जरूरत पड़ती है। हालांकि, अंगदान को लेकर कई मिथक हैं जो गलत धारणाओं को फैलाते हैं और लोगों को अपने अंगों को दान करने से रोकते हैं। हालांकि, नियमों और प्रक्रियाओं के बारे में ज्ञान की कमी भी है अंगदान में एक बड़ी बाधा है। 

डॉ अनंत वीर ने आगे बताया कि अनुमान के मुताबिक, भारत में हर साल लगभग 5 लाख अंगों की जरुरत होती है, लेकिन इस मांग का केवल 2-3% ही पूरा हो पाता है। अंगदान से सम्बंधित सबसे बड़ी गलत धारणा यह है कि मरने के बाद शरीर को अंग भंग किया जाता है जोकि सच नहीं होता है। दान करने पर अंगों को शल्यचिकित्सा द्वारा निकाला जाता है और डोनर के शरीर को दाह संस्कार या अंत्येष्टि के लिए सही सलामत कर दिया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी ने नेत्रदान का संकल्प लिया है, तो आँख को निकालने के बाद एक कृत्रिम आंख डाली जाती है और टिश्यू और पलकें बंद कर दी जाती हैं। पहले से ही अपने अंगों को दान करने की घोषणा कर चुके लोगों के अंगों को निकालने से न तो अतिरिक्त खर्च आता है, न ही किसी भी धर्म की मान्यताओं का उल्लंघन होता है। जो भी व्यक्ति स्वस्थ हो, उसे कोई इन्फेक्शन या संक्रामक बीमारी न हो, जैसे कि हेपेटाइटिस या एचआईवी, या कैंसर आदि तो वह अपने अंगो और टिश्यू को दान कर सकते हैं।“
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