◼️गीता भगवान का हृदय है, जिसे भगवान ने मानवता के कल्याण के लिए प्रकट किया है



रिपोर्ट :- अजय रावत

गाजियाबाद :- 5158वीं गीता जयंती सिद्ध पीठ श्री दूधेश्वर नाथ मठ महादेव मंदिर में धूमधाम से मनाई गई। प्रातः काल भगवान शालिग्राम का दूध, दही, घी, मधु शक्कर एवं गंगाजल से अभिषेक हुआ। उसके बाद श्री दूधेश्वर वेद विद्या पीठ के आचार्य गणों द्वारा वेद मंत्रों के बीच श्रीमद्भगवद्गीता, तुलसी माता का पूजन-अर्चन व गीता पाठ किया गया। इस अवसर पर श्री दूधेश्वर पीठाधीश्वर, श्री पंच दशनाम जूना अखाडा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता, दिल्ली संत महामंडल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व हिंदू यूनाइटिड फ्रंट के अध्यक्ष श्रीमहंत नारायण गिरि महाराज ने कहा कि आज से 5158 वर्ष पूर्व रविवार के दिन प्रातः 9.20 बजे पर जब कुरुक्षेत्र के मैदान में नर के अवतार अर्जुन मोह ग्रस्त थे, तब नारायण के अवतार भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमद्भागवत गीता का उपदेश दिया और मोह में पड़े अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाकर उनके मोह को दूर किया। 

भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को बताया था कि मैं ही परम तत्व हूं मेरे अतिरिक्त इस संसार में कोई दूसरा नहीं है। जो देवताओं की पूजा करता है वह देवताओं को प्राप्त होता है, जो पितरों की पूजा करता है वह पितरों को प्राप्त होता है जो प्रेतों की पूजा करता है वह प्रेतत्व को प्राप्त होगा।  जो मेरी पूजा करेगा वह बैकुंठ लोक को प्राप्त होगा। सब देवी-देवता मेरे ही रूप हैं। श्रीमद्भगवद्गीता सनातन धर्म की प्राण है। गीता, गंगा, गायत्री और गाय हमारी भारतीय संस्कृति की पहचान है। सनातन धर्म में गीता सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। गीता भगवान श्रीकृष्ण का हृदय ही है, जिसे भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन व समस्त मानवता के कल्याण के लिए प्रकट किया था। जिस दिन श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था, उस दिन मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी थी, इसीलिए इस दिन को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है।
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