रिपोर्ट :- गजेंद्र रावत


नई दिल्ली :- कोरोना वायरस के मामले भले ही कम हो रहे हों लेकिन अभी इस महामारी का खतरा टला नहीं है। कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक पैनल ने PMO को रिपोर्ट सौंपी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आने वाला नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट (NIDM) ने तीसरी लहर के मद्दनेजर मिल रही चेतावनियों पर अध्ययन किया, साथ ही पैनल अभी से ही इसको लेकर तैयारियों में जुट गया है।

NIDM ने PMO को सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया कि कोरोना की तीसरी लहर का पीक अक्तूबर में हो सकता है। NIDM की रिपोर्ट में 40 विशेषज्ञों के रायटर की सर्वे का हवाला दिया गया है जिसमें कहा गया है कि 15 जुलाई से 13 अक्तूबर 2021 के बीच कोरोना की तीसरी लहर आने की आंशंका है। अक्तूबर में हालात खराब होंगे और वायरस पीक पर होगा। 

बच्चों पर होगा क्या असर
कोरोना की तीसरी लहर का बच्चों पर कितना और क्या असर होगा इसको लेकर भी रिपोर्ट में बताया गया है। रिपोर्ट में कहा गया कि अभी इसके पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं कि बच्चों पर इस वायरस का असर ज्यादा होगा। रिपोर्ट में कहा कि हालांकि वायरस फैलने से बच्चों में खतरा बढ़ सकता है। दरअसर देश में अभी बच्चों का वैक्सीनेशन शुरू नहीं हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया कि बच्चों में कोरोना का संक्रमण बिना लक्षण वाला देखा गया था और उनमें हल्के लक्षण भी थे लेकिन पहले से बीमार व ज्यादा देखरेख वाले बच्चों के लिए यह काफी चिंता का विषय था।

बच्चों के लिए सुझाए ये उपाय

NIDM ने अपनी रिपोर्ट में बच्चों के लिए डॉक्टरों, स्टॉफ, वेंटिलेटर्स, एंबुलेंस आदि की पूरी व्यवस्था करने को कहा गया है। 2015 के संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में कहा गया था कि देश प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बच्चों के डॉक्टरों की 82 प्रतिशत कमी थी। 

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर बच्चों के चिकित्सकों की 62.8 प्रतिशत पद खाली थे। वर्किंग ग्रुप कमेटी के एक्सपर्ट्स ने समग्र घरेलू देखभाल मॉडल, बाल चिकित्सा क्षमताओं में तत्काल वृद्धि और बच्चों के बीच मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया। 

कोरोना वार्ड को इस तरह से बनाने का सुझाव दिया गया है जिसमें बच्चों की देखभाल करने वाले और उनके माता-पिता बिना संक्रमित हुए उनकी देखभाल कर सकें। 

सामान्य बच्चों और पहले से बीमार बच्चों को वैक्सीनेशन को तत्काल प्राथमिकता दी जाए।

बच्चों की वैक्सीन को तत्काल मंजूरी देने से पहले उनके क्लीनिकल ट्रायल के डाटा की अच्छी तरह से  समीक्षा की जाए।

शिक्षकों और स्कूल स्टॉफ को वैक्सीनेट किया जाए।
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